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Sunday, October 19, 2008

अंतर्घात


आग है, आँधी है या बवंडर है
क्या कहूँ क्या इस जेहन के अन्दर है ।

जिसमे ख्वाब भी छुप-छुप के साँस लेते हैं,
ऐसा चुपचाप सा सोया हुआ ये खंडहर है ।

जिसकी मौजों का ख़ुद उससे कोई रिश्ता ही नहीं,
कितनी तन्हाई में डूबा हुआ समंदर है।

देखा उम्मीद से जिस भी किसी सूरज की तरफ़ ,
बुझ गया रात को ये मंजर है ।

हर तरफ़ राह में शिकारी अंधेरे,
चाँद के हाथ में भी खंजर है।


----डा ० प्रेमांशु भूषण 'प्रेमिल'

Tuesday, September 16, 2008

पापा के लिए

पापा के लिए
माली !
कड़कते घाम में
तुम्हारा
अविश्वसनीय -
अतुल-
अथक श्रम :
वो धौंकती शिरायें,
छलछलाता पसीना,
फूलती साँसे,
शिथिल पेशियाँ ........
क्या सिर्फ़ इसलिए
कि जब फूल महमहाता है-
खिलखिलाता है-
भँवरों को ललचाता है -
हवा के किल्लोल से
लचक-लचक जाता है;
तब तुम्हारी
धुँधलाती बुढाती आँखें ;
आँखें नहीं रहतीं -
स्फटिक हो जाती हैं?
.......
कौन करेगा इस त्याग की तुलना?
कर्ण या दधीचि ?

----डॉ ० प्रेमांशु भूषण 'प्रेमिल'