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Friday, August 29, 2008

मनुष्य

मनुष्य


म्लान नयन, कम्पित बदन
सम्मुख निजन - खंडित भवन
दिशा - रहित रात्रि सघन
मेघ-मंडित गहन गगन
क्षुधा भीषण, त्रास अमित
मार्ग भ्रमित, श्रांत पथिक ।

पंक-गर्भित पग प्रकम्पित
रुग्ण काया, श्वांस लंबित
अथक वृष्टि, पवन विचलित
क्षण-क्षण में पुनः पतित
दामिनि दमकाए तड़ित
क्लांत ह्रदय, श्रांत पथिक ।

गहन -भीषण वन अनंतर
मार्ग मधुमय, दृष्टि उज्जवल
प्रलय के उपरांत कण-कण
सृष्टि नित प्रारम्भ प्रति पल
अजय इच्छा, दृढ़ प्रतिज्ञा
एक मात्र सिद्धांत पथिक

सदा विजयी मनुपुत्र
है वो श्रांत पथिक !!

---------डॉ ० प्रेमांशु भूषण 'प्रेमिल'

Thursday, August 14, 2008

प्रसव - पीड़ा

प्रसव - पीड़ा





एक भीषण , प्रबल आँधी

मेरे इस मस्तिष्क में

फिर चल पड़ी है ,

विचारों की हवा पगली

बदहवास सी साँय - साँय कर

भाग रही है ,

उड़ गए हैं छत

पुरानी धारणाओं

के भवन के ,

क्षत -विक्षत शव

भावनाओं के

टंगे हैं

हर दिशा में ,

वृक्ष घटनाओं के सारे

झूम उठे हैं

थपेडों में हवा के --

कहीं अर्राकर

कड़क कर

टूटती है

कोई टहनी ,

और कितने

वृक्ष जड़ से ही

उखड़कर

सोच की राहों पर

धम्म से गिर पड़े हैं

आड़े-तिरछे !

कई तस्वीरों से पत्ते

अपनी भोगी ज़िन्दगी के

उठते-गिरते-घूमते-

फिर भागते से

इन हवाओं के भंवर में

द्रुत -गति से

हैं पड़े

चकरा रहे जो -

उड़ रही है

धूल शब्दों की

नयन में चुभ रही है ,

लग रहा है

कोई कविता

फिर जेहन में उग रही है !



......... डा ० प्रेमांशु भूषण 'प्रेमिल'