मेज की एक टाँग के
नीचे से सड़ जाने पर,
लगानी पड़ती है उसके नीचे
कोई टेक, कोई अटकन:
(आदर्शों की छोटी टाँग को
वय्वाहरिकता की अटकन दे दो । )
कमीज़ के बाजू की कोहनी
के दरक कर फट जाने पर,
या पैंट के घिस जाने पर
लगानी पड़ती है उनपर
कोई चेपी, कोई पैबंद:
(ईमानदारी की फटी पैंट पर
रुपयों की पैबंद तो लगाने दो । )
दवाई की गोली की कड़वाहट से
जीभ को बचाने के लिए
लगानी पड़ती है उसके ऊपर
शक्कर की मीठी-मीठी
कोई सतह, कोई परत:
(सच्चाई की कड़वाहट पर
झूठ का मुलम्मा तो चढाने दो । )
[आख़िर लंगड़ों को,
कम से कम
बैसाखी का हक़ तो है ? ]
---डॉ ० प्रेमांशु भूषण ‘प्रेमिल’
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Friday, October 31, 2008
Thursday, October 30, 2008
दादाजी की छड़ी
कमरे के अकेले कोने में
खड़ी रहती,
चुपचाप,
समय अपना मकड़जाल
बुनता
उसके चारों ओर,
देखती मुझे
टुक-टुक;
जब झूठ बोलकर मेरी आवाज़
शर्मा जाती,
देखती एकटक;
जब मैं रोटी की दौड़ से
थककर
निढाल
कुर्सी में पड़ जाता-
जब मैं खुश होता-
जब मैं गाता-
रोता-
किसी को ठगता-
या स्वयं ठगा जाता-
सुबह सवेरे जब
धूप की गिलहरी
मेरे बिस्तर पर फिसलती-
या जब रात
मेरी साँसों में सुबकती-
हर दिन-रात,
हर पल-छिन-
हर दम-
एक टक-
टुक-टुक-
चुप-चाप-
निर्विकार-
लगातार-
अपलक-
निहारती रहती
दादाजी की
टेढ़ी-मेढ़ी
घुन खाई छड़ी,
उनके न होने का
एहसास कराती,
हर रोज कुछ और
बुढाती छड़ी !
--डा ० प्रेमांशु भूषण ‘प्रेमिल’
खड़ी रहती,
चुपचाप,
समय अपना मकड़जाल
बुनता
उसके चारों ओर,
देखती मुझे
टुक-टुक;
जब झूठ बोलकर मेरी आवाज़
शर्मा जाती,
देखती एकटक;
जब मैं रोटी की दौड़ से
थककर
निढाल
कुर्सी में पड़ जाता-
जब मैं खुश होता-
जब मैं गाता-
रोता-
किसी को ठगता-
या स्वयं ठगा जाता-
सुबह सवेरे जब
धूप की गिलहरी
मेरे बिस्तर पर फिसलती-
या जब रात
मेरी साँसों में सुबकती-
हर दिन-रात,
हर पल-छिन-
हर दम-
एक टक-
टुक-टुक-
चुप-चाप-
निर्विकार-
लगातार-
अपलक-
निहारती रहती
दादाजी की
टेढ़ी-मेढ़ी
घुन खाई छड़ी,
उनके न होने का
एहसास कराती,
हर रोज कुछ और
बुढाती छड़ी !
--डा ० प्रेमांशु भूषण ‘प्रेमिल’
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